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    Home»Featured»धुरंधर: फिल्म बड़ी नहीं लंबी होनी चाहिए
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    धुरंधर: फिल्म बड़ी नहीं लंबी होनी चाहिए

    Sanjay DubeyBy Sanjay DubeyMarch 22, 2026No Comments3 Mins Read13 Views
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    धुरंधर: फिल्म बड़ी नहीं लंबी होनी चाहिएआनंद फिल्म का एक सदाबहार डायलॉग है “बाबू मोशाय जिंदगी लंबी नहीं बड़ी होना चाहिए़”। देश दुनियां में फिल्मे भी फेंटेसी जिंदगी है।कल्पनालोक में विचरने के लिए मजबूर कर देने वाली फिल्मे मनोरंजन का सबसे सशक्त माध्यम है। हिंदुस्तान में 1896 से फिल्मों का प्रदर्शन हो रहा है। 7 जुलाई 1896 को ल्यूमिनर बंधुओं ने एक रुपए की टिकट में फिल्म दिखाया था। 21 अप्रैल 2013 को मूक फिल्म “राजा हरिश्चंद्र” और 14 मार्च 1931 को बोलती फिल्म आलम आरा ने नये युग की शुरूआत की। ल्यूमिनर बंधुओं ने जो फिल्म दिखाई थी उसका केवल एक शो शाम 6 से 10 बजे था। मूक फिल्म राजा हरिश्चंद्र केवल 40 मिनट की फिल्म थी इस कारण दिन में कई बार फिल्म दिखाई जाती थी। पहली बोलती फिल्म “आलम आरा” फिल्म 124 मिनट( 2 घंटे 4 मिनट) की फिल्म थी। इसके बाद फिल्मों की टाइमिंग बढ़ने लगी। 1941 में बनी फिल्म खजांची 171 मिनट( 2 घंटे 51 मिनट) की थी। 1961 में बनी फिल्म “संगम” की समयावधि 238 मिनट (3 घंटे 54 मिनट) थी।इस फिल्म में दो इंटरवल्स थे। 1970 में प्रदर्शित मेरा नाम जोकर फिल्म 255 मिनट( 4 घंटे 15 मिनट) लंबी फिल्म थी। इस फिल्म में भी दो इंटरवल्स थे।

    लाइन ऑफ कंट्रोल : कारगिल 2001 में बनी फिल्म थी जिसकी लंबाई मेरा नाम जोकर के समान 4 घंटा 15 मिनट ही थी लेकिन इंटरवल एक ही था। लगान ( 3 घंटा 44 मिनट), हाल ही में रिलीज हुई फिल्म धुरंधर(3 घंटा 44। मिनट) हम आपके है कौन ( 3घंटा 36 मिनट ), ,जोधा अकबर (3 घंटा 33 मिनट), कभी खुशी कभी गम(3 घंटा 30 मिनट) और एनिमल( 3घंटा 21 मिनट ) लंबी फिल्मे है। आमतौर पर ऐतिहासिक फिल्मों के प्रदर्शन जिसमें युद्ध का वर्णन होता है उनकी प्रदर्शन अवधि लंबी होना स्वाभाविक है। जैसे ,एलओसी कारगिल, जोधा अकबर लेकिन सामाजिक ताने बाने वाली फिल्म हम आपके है, कौन और कभी खुशी कभी गम फिल्मे भी समय लेने वाली रही। इन फिल्मों में गानों की संख्या भी अधिक थी। लगान एक काल्पनिक क्रिकेट मैच पर आधारित फ़िल्म थी।जब वनडे दिखाना हो तो समय लगेगा ही।हाल ही में रिलीज हुई फिल्म “धुरंधर द रिवेंज” की लंबाई भी 3 घंटा 34 मिनट है।इसका पहला भाग भी 3घंटे 44 मिनट लंबी थी। एक तरफ दर्शक कम समय की फिल्मों की तरफ बढ़ रहे है ऐसे में इतनी लंबी अवधि की फिल्म बनाने के लिए कलेजा होना चाहिए आदित्य धर का कलेजा दो बार मानने लायक है। पाकिस्तान के आतंकवादी नेटवर्क को तहस नहस करने के लिए उन्होंने दो भागो में 7 घंटे 18 मिनट का समय लिया है। दोनों ही भाग की आरंभिक आर्थिक सफलता दर्शा रही है कि उनकी कहानी के प्रदर्शन में दम है। वैसे भी हिंदुस्तान में पाकिस्तान को घर में घुस कर मारने पर राष्ट्रीय खुशी होती है चाहे वह युद्ध हो या क्रिकेट।

    संजय दुबे 🖋️

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