काकरोच जनता पार्टी के स्वयंभू अध्यक्ष अभिजीत दीपके अमेरिका से बड़ी उम्मीद के साथ हिंदुस्तान की राजधानी नई दिल्ली में उतरे थे। उम्मीद करना अच्छी बात है लेकिन उम्मीद के विपरीत शुरुवाती परिणाम आए तो योजना को अमल करने की नीति के संबंध में मंथन करने की जरूरत है। हिंदुस्तान के चीफ जस्टिस सूर्यकांत के द्वारा फर्जी विधि डिग्रीधारियों के द्वारा न्यायालयों की गरिमा को कम करने वालो के लिए “काकरोच” शब्द का उपयोग किया था। छः साल पहले आम आदमी पार्टी से जुड़े अभिजीत दीपके ने अमेरिका में पढ़ाई करते हुए काकरोच शब्द को महिमामंडित कर लिया।सोशल मीडिया में बनी पार्टी है – काकरोच जनता पार्टी। सोशल मीडिया किसी देश विशेष का प्लेटफार्म नहीं है, ये सभी नहीं जानते है। इस प्लेटफॉर्म में चालीस फीसदी अकाउंट फर्जी है, ये बात जानना जरूरी है। एक एक व्यक्ति दस बीस अकाउंट बनाकर जीवन बीता रहा है। दुनियां भर में सात सौ करोड़ की आबादी में हिंदुस्तान विरोधियों की संख्या। हिंदुस्तान में ही चालीस करोड़ होना चाहिए। दस लाख औसत मतदाता के लोकसभा के क्षेत्र में विपक्ष के सांसदों की संख्या दो सौ चौतीस है। प्राप्त मतों का प्रतिशत इकतालीस है।दो हजार चौबीस में लगभग पैसठ करोड़ मत डाले गए थे जिनमें विपक्ष को छब्बीस करोड़ मत मिले थे। ये भी मान लिया जाए कि काकरोच जनता पार्टी को दो करोड़ समर्थक सोशल मीडिया के माध्यम से मिल भी गया तो हिंदुस्तान में विपक्षी मानसिकता का सोशल मीडिया उपयोग। करने वालो में से सिर्फ दस फीसदी लोगों की स्वीकार्यता थी। ये आंकड़ा इस बात की ओर भी संकेत करता है कि देश का कोई भी राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर का मान्यता प्राप्त दल की रुचि इस काकरोच जनता पार्टी में नहीं है। वे दूर से बैठ तमाशा जरूर देख रहे थे दिल्ली के जंतर मंतर में लगे जमावड़े में टुकड़े टुकड़े नारे लगाने वालों की संख्या ज्यादा दिखी।

एसएफआई याने कम्युनिस्ट पार्टी की नौजवान विंग काकरोच के रूप में जरूर दिखे । जिस तरह हल्ला मचा था और जिस तरह से अभिजीत दीपके उम्मीद लगाकर अमेरिका से कार्यक्रम की रूपरेखा परोस रहे थे उससे लग ये रहा थी कि दिल्ली के सड़कों पर तथाकथित जेन जी की असंख्य संख्या बल फैल जाएगी। जंतर मंतर पर जुटी भीड़ उन काकरोच पर प्रश्न चिन्ह लगा सकती है ।जो है लेकिन बाहर नहीं आए। ये जरूर है कि जिस मुद्दे को लेकर अभिजीत दीपके सामने आए वास्तव में वह मुद्दा चिंताजनक से ज्यादा भयावह है। हर प्रतियोगी परीक्षा में पेपर लीक होना उन विद्यार्थियों को तोड़ती है जो एक बार सफल होने की ताकत लगाते है। परीक्षाओं से पहले देश के प्रधान मंत्री, राज्यों के मुख्य मंत्री विद्यार्थियों को दुनियां भर की सलाह देते है। परीक्षाएं रद्द होने पर टूटने की मनोदशा को कोई नहीं समझता है। हर विद्यार्थी का मनोबल इतना मजबूत नहीं होता कि सफल होने से पहले ही परीक्षा आयोजकों के षडयंत्र के चलते फिर से अपना मनोबल जुटा ले। आखिरकार पेपर लीक के चलते परीक्षा रद्द हुई, नए सिरे से फिर परीक्षा होगी लेकिन जिनके बच्चों ने अपनी जीवन लीला खत्म कर ली।हजारों बच्चे जो अब मनोबल जुटा नहीं पा रहे है उसके लिए तो केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पूर्णतः जिम्मेदार है।उन्हें इस्तीफा जरूर देना चाहिए।इस देश में लाल बहादुर शास्त्री जैसे भी मंत्री हुए है जिन्होंने अपने मंत्रालय की असफलता की जिम्मेदारी ली, पद से इस्तीफा दे दिया था। अब नैतिकता तो सब्जबाग साबित हो रही है
