आंबेडकर और भारतीय संविधान 14 अप्रैल का दिन हिंदुस्तान में भीम राव अंबेडकर के जन्मदिन के रूप में विशेष तारीख है। भीम राव अंबेडकर ने अपने दौर में उपेक्षित लोगों के प्रति सामाजिक समानता का आंदोलन खड़ा किया था। उनकी कामना थी कि व्यक्ति को उसके जाति में जन्म लेने के आधार पर आगे बढ़ने का बराबरी से अवसर मिले। लोगों के मन में भीम राव अंबेडकर के बड़ी श्रद्धा है क्योंकि उन्होंने संविधान में आरक्षण की व्यवस्था को रखा था। अंबेडकर जानते थे कि आरक्षण भी अनुसूचित जाति और जनजाति में एक ऐसा वर्ग खड़ा कर देगा जिससे आरक्षण का रोटेशन कुछ परिवारों में सिमट जाएगा। इसकी कारण दस साल में समीक्षा की भी व्यवस्था संविधान में रखी थी आज अंबेडकर जीवित नहीं रहे उनके जाने के बाद आरक्षण की समीक्षा चाह कर भी नहीं होती रही। भारतीय संविधान के निर्माता के रूप में आंबेडकर को गांव के चौराहे से लेकर शहर के प्रमुख हिस्सों में स्थापना ये याद दिलाता है कि भले ही कितनी विपन्नता हो, अवसर के दरवाजे बंद हो, उपेक्षा हो, जिसमें लगन होती है वह भीम राव अंबेडकर बनने की क्षमता रखते है। भीम राव अंबेडकर के जन्मदिन के दिन देश के संविधान निर्माण के इतिहास को भी देखना भीम राव अंबेडकर को सच्ची श्रद्धांजलि देना होगा संविधान के निर्माण में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका संविधान समिति के विधि सलाहकार कर्नाटक के बेनेगल नरसिंह राव की रही थी। उन्होंने दुनिया के महत्वपूर्ण देशों के संविधान का अध्ययन किया।

जो सर्वश्रेष्ठ थी उनको साथ लेकर आए। संविधान के प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ भीमराव आंबेडकर सहित 6सदस्यो – कृष्णा स्वामी अय्यर, कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी,मोहम्मद सद्दुल्ला, एन. माधवराव, टी.टी.कृष्णमूर्ति, एन गोपाल स्वामी अय्यर, ने संविधान के प्रारंभिक प्रारूप सोपा था। संविधान सभा के विधि सलाहकार के रूप में बेनेगल नरसिंह राव का चयन पंडित जवाहरलाल नेहरू और वल्लभ भाई पटेल ने किया था। नरसिंह राव मद्रास और केंब्रिज से विधि के स्नातक रहे थे। 1910 में भारतीय सिविल सेवा में चयनित हुए थे।1939 में कलकत्ता हाई कोर्ट के न्यायधीश रहे।1944 में जम्मू कश्मीर के राजा हरिसिंह ने नरसिंह राव को जम्मू कश्मीर का प्रधानमंत्री बनाया था। नरसिंह राव 1945 से 1948 तक अमेरिका,ब्रिटेन,कनाडा आदि देशों का भ्रमण कर उनके संविधान का गहन अध्ययन किया था। नरसिंह राव द्वारा प्रस्तुत प्रारंभिक प्रारूप को प्रारूप समिति के सात सदस्यो ने चिंतन मनन कर सुधार कर सौंपा था। संविधान के निर्माण की दास्तां भी रोचक है। बाल गंगाधर तिलक , अंग्रेजो की नियत को बहुत पहले ही भांप लिए थे इस कारण 1895 में उन्होंने संविधान सभा के गठन की मांग की थी। 1920 में महात्मा गांधी की अध्यक्षता में कामनवेल्थ ऑफ इंडिया बिल में मांग दोहराई गई। 1930 में पंडित जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष बने तो भी ये मांग रखी गई। 6 दिसंबर 1946 को संविधान सभा का गठन हुआ जिसके 389 सदस्य अप्रत्यक्ष निर्वाचन पद्धति से चयनित हुए। 9 दिसंबर 1946 को हुई पहली बैठक हुई। मुस्लिम लीग ने इसका पृथक राष्ट्र के नाम पर बहिष्कार किया। 15 अगस्त 1947 को देश के स्वतंत्र होने के बाद 299 सदस्य शेष रहे। 90 सदस्य पाकिस्तान के प्रांत के होने के कारण वहां चले गए। छत्तीसगढ़ जो तत्कालीन मध्य प्रांत और बरार ( Central province and barar) का हिस्सा था। यहां से घनश्याम गुप्ता(दुर्ग),किशोरी मोहन त्रिपाठी(रायगढ़)बैरिस्टर ठाकुर छेदी लाल (बिलासपुर) राम प्रसाद पोटाई (कांकेर) सहित पंडित रविशंकर शुक्ल भी संविधान सभा के सदस्य थे। इन सभी के हस्ताक्षर संविधान के मुख्य प्रारूप में है। 26 नवंबर 1949 को भारत का संविधान पूर्ण हो गया। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि संविधान सभा में 15 महिलाएं भी अपना पक्ष रखी। ये महिलाएं थी – हंसा मेहता,राजकुमारी अमृत कौर,दुर्गा बाई देशमुख,विजय लक्ष्मी पंडित,बेगम एजाज रसूल, दक्षिणामयि वेलामुदन, अम्मू स्वामी,सरोजनी नायडू,सुचेता कृपलानी, रेणुका रॉय, पूर्णिमा बनर्जी,लीला(नाग) रॉय,मालती चौधरी, एनी मैस्किन, और कमला चौधरी। इतने लोग भीम राव अंबेडकर के संविधान निर्माण में सहयोगी रहे
