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    Home»Featured»क्या हम कठिनतम जिंदगी को जीने पर मजबूर होते जा रहे है?
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    क्या हम कठिनतम जिंदगी को जीने पर मजबूर होते जा रहे है?

    Sanjay DubeyBy Sanjay DubeySeptember 27, 2025Updated:October 2, 2025No Comments4 Mins Read0 Views
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    क्या हम कठिनतम जिंदगी को जीने पर मजबूर होते जा रहे है? भूत वर्तमान और भविष्य, तीन शब्दों में जिंदगी चलती है। लाखों करोड़ो लोगों का कहना है कि व्यक्ति को वर्तमान में जीना चाहिए। ये भी कहा जाता है कि अतीत से सीखना चाहिए और अनुभव का फायदा उठाकर जिंदगी को खुशहाल बनाना चाहिए। आप अपने स्वयं से पूछिए कि आप अतीत से क्या सीखते है? कहने के लिए कुछ भी हो लेकिन सच ये है कि हम अतीत से सुख का टोकना लेने के बजाय दुख का पिटारा लेकर वर्तमान में जीते है। सबसे कठिन स्थिति तब होती है जब तथाकथित पति पत्नी के बीच बहस होती है। बहस का मुद्दा कुछ भी हो लेकिन दृष्टांत और उदाहरण ऐसे होते है जिससे बहस उग्र रूप धारण कर लेता है।परिवार, बड़ा हुआ करता था तो स्त्री के पास बहस करने के अवसर कम उपलब्ध हुआ करते थे।वातावरण ही ऐसा हुआ करता था। एक छत के नीचे, एकांत ही नहीं मिलता था।दूसरा कारण था आर्थिक रूप से पति के ऊपर निर्भर रहना, जिसके चलते बहस की गुंजाइश कम हुआ करती थी।वक्त बदल चुका है। संयुक्त परिवार टूट चुके है, अपवादस्वरूप है लेकिन इतने भी नहीं कि उन्हें आसानी से देखा जा सके। माइक्रो परिवार की परिकल्पना जन्म ले चुकी है। हम दो हमारे एक ज्यादा से ज्यादा दो। इस प्रकार का परिवार स्वतंत्र रूप से दो बीएचके के घर या फ्लैट में कम्युनिटी जीवन जी रहा है।याने कोई कार्यक्रम हो तो इकट्ठा हो जाएगा।इसके बाद की जिंदगी में केवल काम और अनिवार्य जिम्मेदारियां है।परिवार में सदस्य उंगली में गिनने लायक है। स्त्री के परिवार से भले संबंध है लेकिन पति के परिवार से घनिष्ठता नहीं है।ये सत्य बात है।इसका परिणाम ये होता है कि पति भी पत्नी के परिवार के प्रति बराबर की धारणा को दिन ब दिन मजबूत करते जाता है।हर परिवार में ऐसे छण आते है और आयेंगे ही जहां विचारों में फर्क आएगा, तनाव के ऐसे अवसर आयेंगे जब मानसिक संतुलन लड़खड़ाएगा, तनाव होगा, शाब्दिक उलाहना का दौर आएगा।परस्पर ताने दिए सुने जाएंगे।इन अवसरों में क्या होता है?अतीत के ऐसे दृष्टांत निकाले जाते है जिसमें सामने वाले ने कोई गलती की हो या उसके काम में कमी रह गई हो या कोई ऐसी भूल किया हो जिसके सामने आने से क्रोध का बढ़ना और शब्दों को मर्यादा का खोना आसान हो जाता है। बहस में ऐसी बातों को गड़े मुर्दे उखाड़ना कहा जाता है।मेरा अपना आंकलन है कि मुर्दा जिस दिन गाड़ा जाता है उसके अगले पल से उसके सड़ने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। जितने अधिक समय बाद मुर्दा उखाड़ा जाएगा उससे बदबू ही आएगी।वातावरण बदबूदार होंगा। निकालने के बाद फिर से गाड़े और निकाले गए मुर्दे से आप किसी भले वातावरण की उम्मीद कैसे कर सकते है? हमारी दिक्कत यही है कि हम बहस के दौरान अतीत में हुए गलतियों को इतने बार बताते है कि लगता है कि बहस की केवल पुनरावृति होती है।गड़े मुर्दे, वही होते है जिनका सिर्फ दोहराव होता है।क्या हमारी जिंदगी में होने वाले बहस,झगड़े में ऐसा नहीं हो सकता कि हम ठंडे दिमाग से तात्कालिक समस्या का हल खोजे।उन बातों से बचे जिसका दोहराव बीते सालों में न जाने कितने बार हो चुका है। मुर्दे को गड़े रहने की भलाई को हमें समझने की जरूरत है। न जाने इसके चलते एक छत के नीचे रहने वाले पति पत्नी या बच्चों के बीच के संबंध औपचारिक हो कर रह गए है।याद रखिए आपके परिवार के सदस्य, आपके माता पिता, रिश्तेदार सहित मित्र आपके संबंधों में स्थाई दखल नहीं दे सकते है, उनका महत्व बहस या लड़ाई झगड़े में अस्थाई ही है। निराकरण आप को ही करना है।सुझाव यहीं है कि गड़े मुर्दे मत उखाड़िए, बदबू ही फैलेगी

    ✍️ संजय दुबे

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