बस्तर: केंद्रीय गृह मंत्रालय के सफलता की दास्तान
कहा जाता है कि देश के राज्यों में गहराती समस्याओं का हल करने का पहला जिम्मा राज्य सरकार का होता है। समस्या राज्य विशेष से निकलकर आसपास के दो तीन राज्यों में भी पसर जाए तो भी हल के लिए आपसी समन्वय से हल करने का जिम्मा होता है।
नक्सलवाद, ऐसी ही समस्या थी। जन्म भले ही पश्चिम बंगाल में हुआ लेकिन फला फूला छत्तीसगढ़ में, आंध्र प्रदेश में, महाराष्ट्र में और उड़ीसा में। चारों राज्यों में अलग अलग दलों की सरकार होने की वजह से समन्वय हो ही नहीं पाया उल्टा एक दूसरे पर तोहमत लगा कर जिम्मेदारी से बरी होते रहे। केंद्र में गठबंधनों की सरकार होने की वजह से नक्सलवाद के प्रति अनदेखापन चलता रहा।
हिंदुस्तान के वर्तमान गृह मंत्री अमित शाह ने बीड़ा उठाया।राज्य की पुलिस के बजाय सीआरपीएफ के जरिए नक्सलवाद को खत्म करने के लिए कमर कसा।

अमित शाह की कार्यप्रणाली अनेक विरोधियों को नागवार गुजरी। राहुल गांधी ने तो कितने हिड़मा मारोगे, हर घर से हिड़मा निकलेगा के नारे के समर्थन में ट्वीट भी किया। अर्बन नक्सली समर्थकों में विरोध का स्वर उठाया लेकिन गृह मंत्री ने नक्सलियों के ग्रह नक्षत्र के योग पलट कर रख दिया। इनकाउंटर के डर ने सैकड़ों नक्सलियों को समर्पण पर मजबूर किया।जो नहीं किए वे मार दिए गए।
अमित शाह ने स्वीकार किया कि छत्तीसगढ़ में चाहे कांग्रेस का कार्यकाल रहा हो या भाजपा का, दृढ़ इच्छा शक्ति का अभाव रहा। यद्यपि बस्तर के पिछड़ापन के लिए पचास साल की सरकार को कोसा गया। इसमें तीस साल कांग्रेस और बीस साल भाजपा के रहे है। अगले पांच साल में बस्तर की तस्वीर बदलने की बात हुई है।वर्तमान में चल रही सरकार का के पास ढाई साल है।उसके बाद किसकी सरकार बनेगी ये अधर का प्रश्न है।
