काकरोच जनता पार्टी; रील और रियल पार्टी
आमतौर पर काकरोच गंदगी में पनपने वाला जीव है। हिंदुस्तान में दो सौ तीस अरब का कीटनाशक इनको खत्म करने के लिए उपयोग किया जाता है। संडास के चैंबर से लेकर किचन की गंदगी में पनपने वाला काकरोच यूं तो व्यक्तिगत सिरदर्द है लेकिन सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस साहब ने एक मामले में काकरोच शब्द का उपयोग क्या किया , काकरोच राष्ट्रीय मुद्दा बन गया।
मौके की नजाकत को अवसर में बदलने की खूबी हिंदुस्तानियों में ज्यादा होती है।आनन फानन एक व्यक्ति इंस्टाग्राम में रील पार्टी बनाता है और देखते देखते इसके फॉलोअर्स डेढ़ करोड़ पहुंच जाती है। देश में सत्तारूढ़ पार्टी के फॉलोअर्स संख्या सत्यासी लाख है।
कहने के लिए डेढ़ करोड़ फॉलोअर्स संख्या किसी व्यक्ति की प्रसिद्धि का पैमाना हो सकता है लेकिन जमीनी स्तर पर ये केवल एक सनसनी से ज्यादा कुछ नहीं है।
फर्जी डिग्री और धारक
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस साहब सूर्यकांत जी ने संशोधित रूप से अपने पहले कही बात में संशोधन किया है।उनके हिसाब से काकरोच और परजीवी होने का मतलब फर्जी लॉ डिग्रीधारी है । ऐसे डिग्रीधारी मीडिया,सोशल मीडिया और पीआईएल के जरिए न्यायालय पर दबाव बनाने का काम करते है।
प्रश्न ये उठता है कि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस का नजरिया इतना संकीर्ण कैसे हो गया कि उन्हें फर्जी डिग्रीधारी केवल कानून के क्षेत्र में ही दिखे?
मुन्ना भाई और मुन्नी बाई केवल कानून के क्षेत्र में ही सीमित नहीं है। चाहे सीए हो या डॉक्टर हो या इंजीनियर हो या फिर
आई ए एस हो या आईपीएस कुछ न कुछ मात्रा में फर्जी डिग्रीधारी है। ऐसे लोग पकड़ नहीं आते है ये अलग बात है।
एक समय था जब देश में इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज केवल शासकीय हुआ करते थे। उदारवाद के चलते निजी क्षेत्र में व्यापारियों उद्योगपतियों ने फ़ायदे के लिए इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज खोले। महंगी फीस के बल पर सामर्थ्यवान परिवार के बच्चे इनमें अयोग्य होने के बावजूद घुसे।
आज देश में 3600 निजी इंजीनियरिंग कॉलेज और 290 निजी मेडिकल कॉलेज सहित 1700 निजी लॉ कॉलेज है।इनका संचालन कैसे हो रहा है, क्यों हो रहा है, कौन कर रहा है ये सब जानते है। हो सकता है कि इनमें कुछ समाज सेवा के लिए आए हो लेकिन बहुतायत संस्थान पैसे दो डिग्री लो सिद्धांत पर चल रहे है। ला कॉलेज का हाल पहले कैसे रहा है ये सब जानते है।रात को कॉलेज इसलिए लगता था क्योंकि पढ़ाने वाले वकील हुआ करते थे जो दिन में प्रेक्टिस करते थे। 1988 में पहला नेशनल ला यूनिवर्सिटी बैंगलोर में अस्तित्व में आया था। वर्तमान में केवल 27 नेशनल ला यूनिवर्सिटी है। पंद्रह सौ लॉ कॉलेज निजी क्षेत्र में है।सूर्यकांत जी की इस बात को बल मिल सकता है कि डेढ़ हजार ला कॉलेज कैसे प्रोडक्ट बाजार में ला रहे होंगे।
देश में निजी क्षेत्र के क्या कुछ शिक्षण संस्थानो को छोड़ कर बाकी सही में प्रतिभावान छात्रों को आगे ला रहे है? नहीं। ये लोग व्यापार कर रहे है।मुनाफे के लिए डिग्री बेच रहे है।
देश में आईएएस / आईपीएस परीक्षा के लिए अधिकतम शैक्षणिक योग्यता किसी भी संकाय में स्नातक डिग्री है।
इस देश का लगभग हर मां बाप अपने बच्चे का भविष्य सुरक्षित करने के लिए या तो इंजीनियर या डॉक्टर बनाना चाहते है।इसके लिए उन्हें कोचिंग सेंटर में झोंक देते है।अभी सीए और हाई और सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेसी करने वालो का भी बाजार है। आप किसी भी कोर्ट में चले जाइए दो प्रकार के एडवोकेट है पता चलता है।एक है जो कानून के तलबगार है,सिद्धांत की लड़ाई लड़ते है एक वे भी है जो सेटिंग के लिए जाने जाते है। इन्हें रजिस्ट्रेशन से लेकर रोस्टर और किस जज के कोर्ट में केस जाएगा , इसकी पुख्ता जानकारी होती है। अगर सूर्यकांत जी ऐसे लोगों के बारे में संशोधित बयान दे रहे है तो ठीक है।

देश में चुनाव आयोग को राष्ट्रीय , क्षेत्रीय आदि दल को पंजीकृत करने का अधिकार है। मान्यता प्राप्त करने के लिए लोक अथवा विधान सभा चुनाव में निर्धारित प्रतिशत में वोट पाने की अनिवार्यता होती है हिंदुस्तान में भारतीय जनता पार्टी ,भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ,आम आदमी पार्टी ,बहुजन समाज पार्टी ,भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी),नेशनल पीपुल्स पार्टी , राष्ट्रीय पार्टी है। समाजवादी पार्टी, तृण मूल कांग्रेस, तेलगु देशम, बीजू जनता दल, राष्ट्रीय जनता दल क्षेत्रीय पार्टी से ऊपर नहीं आ सकी है।
काकरोच जनता पार्टी,एक मसखरा पार्टी है जिसका चुनाव चिन्ह है, मेनिफेस्टो है।सदस्यता की अनिवार्यता है जो बेढ़ंगे है। कई बार मजाक मजाक में अनहोनी भी हो जाती है और राजनीति क्षेत्र में ऐसे परिवर्तन मारक साबित होते है। हनुमानगढ़ में बीते पच्चीस साल से नगीना बाई, जो किन्नर समाज का प्रतिनिधित्व करती है, पार्षद है। 2000 के साल में मध्य प्रदेश के सोहागपुर से किन्नर शबनम मौसी ने विधायक का चुनाव जीत लिया था।2015 में रायगढ़ मेयर पद पर मधु बाई की जीत में राजनीति में चुनौती तो दिखाई है। कटनी मध्य प्रदेश की महापौर भी किन्नर कमला मौसी रह चुकी है। ऐसे परिवर्तन से समाज में मिसाल तो बनते है लेकिन सफलता बहुत सीमित रहती है।
आजकल का दौर सोशल मीडिया का है।एक अरब छियालिस करोड़ की आबादी वाले देश में एक सौ छब्बीस करोड़ मोबाइल धारक है। इनमें से एक डेढ़ प्रतिशत लोगों का रुझान किसी को ट्रेडिंग में डाल सकता है। इसका मतलब ये नहीं है कि यह स्थायित्व है।दूसरे मुद्दे पहले मुद्दे को खत्म कर देते है। सोशल मीडिया में किसी रील की जिंदगी दो तीन दिन से ज्यादा नहीं होती है
