मेरा क्या होगा कालिया आज मेरा मन “मामा” को कोसने का हो रहा है। ये मामा मेरे सामाजिक रिश्तेदारी में नहीं आते है।ये मामा ,मध्यप्रदेश के बुधनी के विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के विधायक रहे है , कभी विदिशा से सांसद हुआ करते थे अब फिर से सांसद हो गए है, केंद्र में कृषि मंत्री है। दो साल पहले मध्य प्रदेश,राजस्थान, और छत्तीसगढ़ के विधान सभा चुनाव हुए थे, मामा ने राजनीति में ऐसा दांव फेंका कि विरोधी पार्टी तो चित्त हुई हुई पुरुष वर्ग भी चित्त हो गया। मामा ने हर परिवार के खासकर बेटी को रिश्ते में सच्चे मन से भांजी बना कर उनके पढ़ाई सहित स्वास्थ्य आदि का जिम्मा ले लिया।भांजे, पुरुष हुआ करते थे तो उनको उनके पुरुषार्थ पर छोड़ दिया।

रिश्ते में हम तुम्हारे मामा होते है नाम है शिवराज सिंह चौहान, ये आदर्श वाक्य ऐसा जादू किया कि शिवराज सिंह चौहान मध्य प्रदेश की महिलाओं के भाई भी बन गए, रिश्ते में। रक्षा बंधन और भाई दूज त्यौहार में रिश्ता भी निभा गए। मुख्यमंत्री रहते हुए “लाडली बहना” योजना चला दी। लाडली बहनों को हर महीने नगद राशि देने लग गए। शिवराज के मामा बनने की परंपरा को राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी बिना मामा के चेहरे का जादू चलाया गया और नतीजा ये निकला कि विष्णु मामा छत्तीसगढ़ और मामा राजस्थान में काबिज हो गए। आगे के चुनाव में हरियाणा में नायब सिंह महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस और बिहार में नीतीश कुमार भी जाने अंजाने में मामा बन गए ।ये लोग मामा बन गए लेकिन इन राज्यों के पुरुषों को मामा बना दिए। देश के जिस राज्य में चुनाव हुए या हों रहे है या होंगे महिलाएं, पुरुष मुख्यमंत्री की बहने ही बनेगी उनको हर महीने तयवोशुदा राशि मिलेंगी, पश्चिम बंगाल में अमित मामा ने तीन हजार रुपए हर बोना( बहन) को देने का संकल्प किया है। पश्चिम बंगाल की बहने, अमित शाह को मामा बनाती है,या मामा बना देंगी ये चार मई को पता चलेगा। वैसे सामाजिक रिश्ते में पत्नी का भाई, बच्चों के मामा कहलाते है तो बहन के पति के साले भी माने जाते है। इस मामले में साला, जीजा के प्रति नहीं बल्कि जीजा, साले के प्रति देनदार होता है।सारी खुदाई एक तरफ जोरू का भाई एक तरफ!राजनीति के मामा भले ही पुरुष है लेकिन इनकी जवाबदेही देश राज्य में महिलाओं के प्रति हो चली है। सत्ता के ताले की चाबी बहनों के पास है भांजियों के पास है। जीजा और भांजे तेल लेने भेज दिए गए है। उनको पुरुषों के नाम पर ठेंगा ही मिल रहा है, मिलेगा। महिलाओं को कमोबेश हर जगह प्रमुखता मिल रही है। वे अधिकांश योजनाओं में मुखिया बन रही है या लाभान्वित हो रही है।बेटी पढ़ाओ बढ़ाओ जैसे नारे दौड़ रहे है।पुरुष, संकल्प पत्र में खुद को खोज रहा है। कालिया से पूछ रहा है “मेरा क्या होगा कालिया”
