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    Home»Featured»डाक्टरों का सच ,कड़ुआ तो है
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    डाक्टरों का सच ,कड़ुआ तो है

    mitaanindiamediaBy mitaanindiamediaApril 11, 2026No Comments4 Mins Read0 Views
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    डाक्टरों का सच ,कड़ुआ तो है छत्तीसगढ़ की भाजपा के नेताओं में “कद्दावर”शब्द का उपयोग सिर्फ एक व्यक्ति बृज मोहन अग्रवाल के लिए किया जाता है। क्यों किया जाता है ये जानना जरूरी नहीं है, सबको पता है। जिस व्यक्ति ने कांग्रेस और भाजपा के सत्ता में रहने के दौर में रायपुर शहर और परिसीमन के बाद रायपुर दक्षिण से 1990 से लेकर 2024 याने लगातार चौतीस साल विधायक रहे। अभी हाजिर मध्यप्रदेश और 2000 में बने छत्तीसगढ़ राज्य में मंत्री भी रहे। ऐसी आम धारणा है कि उनके ” बड़े कद” जिसके चलते वे कद्दावर है उसे छोटा करने के लिए रायपुर लोकसभा सीट से सांसद प्रत्याशी बनाया गया। रायपुर लोकसभा से कांग्रेस का अंतिम प्रत्याशी विद्याचरण शुक्ल जो 1991 में जीते थे।1996 से अगले तीस साल में भाजपा के ही रमेश बैस,सुनील सोनी और अब ब्रजमोहन अग्रवाल सांसद बने है। सवा पांच लाख मतों से ब्रजमोहन अग्रवाल विजई हुए थे। वैसे रायपुर दक्षिण विधानसभा सीट से भी उनकी जीत सड़सठ हजार मतों की थी।ब्रजमोहन अग्रवाल को छत्तीसगढ़ राज्य की राजनीति में अलग ही दर्जा प्राप्त है।”सबसे दोस्ती किसी से बैर नहीं” के सिद्धांत में चलकर ब्रजमोहन अग्रवाल का एक औरा बना हुआ था। लाख प्रयास के बावजूद भाजपा का कोई भी विधायक , ब्रजमोहन अग्रवाल के समकक्ष नहीं पहुंच पाया।खैर, बात कद्दावर होने की हो रही है। ब्रजमोहन अग्रवाल के सांसद बनने पर पार्टी के भीतर ही प्रत्याशा करने वाले अनेक प्रत्याशियों के जान में जान आई थी कि चलो बरगद की जगह बदली तो! छत्तीसगढ़ की धरा में कोई अन्य फल फूल नहीं पा रहा था। बरगद की अपनी प्रवृत्ति होती है, जहां भी होता है उसके बरगद होने के अस्तित्व बना रहता है। सांसद बनने के बाद ब्रज मोहन अग्रवाल की स्पष्टवादिता बढ़ने लगी।जन विधायक मुद्दों में बृजमोहन मुखर होने लगे तो बाते भी होने लगीकल डाक्टरों के मुद्दे पर बेबाक होकर बृजमोहन अग्रवाल मुखर हुए। प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में 1700 डॉक्टर्स के पद खाली है।सालों से सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों के पद खाली होने की संख्या बढ़ते जा रही है। अस्पताल के अलावा चिकित्सा महाविद्यालयों में हाल बुरा होते जा रहा है।पढ़ाने वाले नहीं मिल रहे है। इसी बात को लेकर बृजमोहन अग्रवाल ने नये मेडिकल कॉलेज खोलने पर अपनी राय रखी। सच बात भी है कि दुकान बना दो और दुकानदार न मिले तो दुकान की क्या कीमत?देश और प्रदेश दोनों में शासकीय अस्पताल में डॉक्टर्स की कमी जगजाहिर है। एमबीबीएस और एमएस के बाद अगर दो, तीन साल की अनिवार्यता के चलते कमोबेश डॉक्टर्स मिल भी जा रहे है। लाखों की सिक्योरिटी राशि डूबत होने का डर न हो तो बहुत से डॉक्टर जिंदगी में कभी भी सरकारी अस्पताल का मुंह न देखे। डॉक्टर सरकारी अस्पताल से क्यों बचते है?निजी अस्पतालों में अपने मन और शर्तों में काम करने और आर्थिक लाभ पाने के चलते डॉक्टर्स सरकारी अस्पताल से दूरी बनाते है, ये स्वीकार्य बात है इसके अलावा सरकारी अस्पताल में जनता के प्रति कम सरकार और जन प्रतिनिधियों के प्रति जवाबदेही के अलावा जन प्रतिनिधियों और मीडिया अनावश्यक का अनावश्यक दबाव डाक्टर्स को सरकारी अस्पताल से दूर करते जा रहे है। निजी अस्पतालों में कागजी कामकाज नहीं के बराबर है लेकिन सरकारी अस्पताल में रोजमर्रा का लिखाई काम है। जवाबदेही अलग, बैठकें अलग से सिरदर्दी है। विकासखंड से लेकर जिलास्तर तक कभी भी आयोजित बैठके डॉक्टर्स के दैनिक कार्यों में अनावश्यक हस्तक्षेप है। इनके चलते डॉक्टर्स सरकारी अस्पताल से दूर हो चुके है।इस कारण से विशेषज्ञ डॉक्टर्स की कमी से सरकारी अस्पताल जूझ रहे है और आगे जू भी। इस सच को बृजमोहन अग्रवाल ने सबके सामने रखा है। सच कड़ुआ होता है और अगर सच को कद्दावर व्यक्ति कह दे तो सच और भी कड़ुआ हो जाता है जैसे नीम चढ़ा करेला।

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