गोवर्धन और पूजा आदिम युग में व्यक्ति को मां के अलावा अगर किसी स्वीकृत पशु से सामान्य प्रतिरोध के बाद दूध मिल सकता था तो वह पशु गाय थी।इससे परे खेत में कृषि कार्य के लिए बैल उपयोगी रहा। इन दोनों की संख्या बल ही “पशु धन”नाम मिला। देवी देवताओं में बैल शिव के वाहन के रूप में प्रतिष्ठित है ही। इसके साथ साथ गाय में “कामधेनु” प्रतिष्ठित है जिसे ऋषियों से चुराने की कथा भी है। ये वही समय सूचक है जिससे एक जमाने में गोधूली होने के समय का ज्ञान हुआ करता था।आज भी विवाह के कार्डो में इस शब्द का उपयोग होता हैआज गोवर्धन पूजा है। गौ वर्धन (संख्या वृद्धि) की उपयोगिता और महत्ता किसी से छिपी नहीं है। मां के दूध के बराबर या ज्यादा ही उपयोगी। दही, मही,घी, आज के युग का अनिवार्य पौष्टिक पदार्थ पनीर, का सृजन भी दूध से ही होता है।दूध के सामयिक होने के कारण गाय आज भी सबसे उपयोगी पशु है(जब तक उसमें दूध देने का सामर्थ्य है) इसी वजह से गाय उन लोगों की संपत्ति है जिनका जीवन यापन इससे चलता है। इसके अलावा एडवर्ड जैनर ने गाय के खूर में होने वाले पश से चेचक के टीके का आविष्कार भी किया था। धार्मिक रूप से गौ माता है। इनकी पूंछ पकड़ वैतरणी पार किए जाने का उल्लेख है। मरते व्यक्ति को गाय की पूंछ पकड़ाने की हर संभव कोशिश होती है।दान परंपरा में गौदान बहुत पुण्य कार्य है।आज के दिन, इन्हें भोजन कराने से व्यक्तियों को धार्मिक और आत्मिक शांति प्राप्त होती है। छप्पन भोग की हकदार आज गाय होती है,बैल नहीं।बैल के लिए अलग दिन त्यौहार होता है, जिसे पोला कहा जाता है।देश में कृष्ण को दर्शन माना जाता है।उनके यादव वंश को गौ संवर्धन का जिम्मा आज भी वंशानुगत मिला हुआ है।गैर जाति के लोग भी दूध का व्यवसाय करे तो जब तक पूछ न लिया जाय या जान न लिया जाय, यादव ही माने जाते है। वे गाय जो जब तक जन्म देने के बाद दूध देने का सामर्थ्य रखती है उनका पूज्यनीय होना स्वाभाविक है। आज प्रश्नगत बात है कि वे गाय जो दूध देने की प्रासंगिकता खो चुकी है,उनकी स्थिति क्या है?उन्हें घर निकाला कर दिया जाता है।उनके भोजन की व्यवस्था खत्म कर दी जाती है।उन्हें शासकीय रूप से आवारा मान लिया जाता है, ये हाइवे में बैठ कर यातायात को प्रभावित करती है,दुर्घटना के संभावना को बढ़ाती है। उनकी तस्करी होती है।समय से पहले वे बूचड़ खाना में पहुंच जाती है।काश छप्पन भोग को एक एक दिन एक एक भोग ऐसे आवारा गाय को देने की परंपरा जन्म ले तो शायद सही में गौ वर्धन पूजा सामयिक हो जाए|
